Uttarakhand Tree Cutting : देहरादून। उत्तराखंड में भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोरलेन/सिक्सलेन हाईवे परियोजना को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सड़क चौड़ीकरण के लिए हजारों पेड़ों की कटाई का काम तेज़ी से जारी है, जबकि दूसरी ओर पर्यावरण प्रेमी, स्थानीय नागरिक, छात्र और सामाजिक संगठन लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पूरे मामले ने अब राज्य में विकास बनाम पर्यावरण की बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया है।
बताया जा रहा है कि इस परियोजना के लिए तीन हजार से अधिक पेड़ों को काटने की योजना बनाई गई है। कई रिपोर्टों में यह संख्या 4,000 से भी अधिक बताई गई है। यह इलाका शिवालिक वन क्षेत्र और हाथियों के कॉरिडोर के बेहद करीब माना जाता है, इसलिए पर्यावरणविदों का कहना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से जंगल, वन्यजीव और स्थानीय पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ सकता है।
पिछले कई दिनों से विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। बड़ी संख्या में लोग सड़क किनारे पहुंचकर पेड़ों से लिपट गए और ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की याद दिलाई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विकास ज़रूरी है, लेकिन उसके नाम पर प्रकृति का विनाश स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आंदोलन में स्थानीय युवाओं के साथ कई पर्यावरण कार्यकर्ता भी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने उनकी आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया और पेड़ों की कटाई जारी रखी। विरोध के दौरान कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार 13 लोगों को शांति भंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें बाद में निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह इलाका केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां मौजूद घने जंगल हाथियों समेत कई वन्य जीवों के प्राकृतिक आवागमन का हिस्सा हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष और पर्यावरणीय असंतुलन को बढ़ा सकती है।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण से यातायात आसान होगा Uttarakhand Tree Cutting
वहीं परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण से यातायात आसान होगा, दुर्घटनाओं में कमी आएगी और क्षेत्र के विकास को नई गति मिलेगी। प्रशासन का दावा है कि परियोजना के दौरान पर्यावरणीय नियमों का पालन किया जा रहा है तथा जहां संभव होगा वहां प्रतिपूरक पौधारोपण और अन्य संरक्षण उपाय किए जाएंगे।Uttarakhand Tree Cutting
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है। पेड़ों से लिपटे प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें और वीडियो लगातार वायरल हो रहे हैं। कई लोग इसे उत्तराखंड के ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की नई तस्वीर बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग विकास परियोजनाओं के समर्थन में भी अपनी राय रख रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क, अस्पताल और अन्य आधारभूत सुविधाएं किसी भी राज्य के विकास के लिए आवश्यक हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण को नज़रअंदाज़ करके किया गया विकास भविष्य में भारी कीमत वसूल सकता है। इसलिए सरकार, स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच संतुलित समाधान निकालना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
फिलहाल उत्तराखंड में यह मुद्दा केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। यह विकास, जंगल, जलवायु और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। आने वाले दिनों में प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत से क्या रास्ता निकलता है, इस पर पूरे देश की नज़र बनी हुई है।
















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