Ken Betwa Link Project: छतरपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर विरोध लगातार तेज़ होता जा रहा है। एक तरफ सरकार इस परियोजना को बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने वाला ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीण, आदिवासी और किसान अपने पुनर्वास, मुआवज़े और जंगल-जमीन के अधिकारों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। हाल के दिनों में प्रदर्शन और भी तेज़ हो गया है तथा कई जगहों पर प्रतीकात्मक विरोध, जल सत्याग्रह और चिता आंदोलन जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए गए हैं।
सरकार का दावा है कि करीब 45 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुल 13 ज़िलों में सिंचाई की सुविधा बढ़ेगी, लाखों लोगों को पीने का पानी मिलेगा और बुंदेलखंड जैसे सूखा प्रभावित क्षेत्र को बड़ी राहत मिलेगी। दिसंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना की आधारशिला रखी थी और इसे देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना बताया गया था।
लेकिन दूसरी ओर प्रभावित परिवारों का कहना है कि विकास की कीमत उनसे उनकी ज़मीन, जंगल और रोज़गार छीनकर वसूली जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की गई है, उन्हें अब तक पूरा और पारदर्शी मुआवज़ा नहीं मिला। कई परिवारों का यह भी कहना है कि पुनर्वास की प्रक्रिया अधूरी है और प्रशासन की ओर से स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही।

ग्रामीणों की मांग है कि पहले पुनर्वास और उचित मुआवज़ा सुनिश्चित किया जाए Ken Betwa Link Project
आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि उनकी मांग सिर्फ़ इतनी है कि पहले पुनर्वास और उचित मुआवज़ा सुनिश्चित किया जाए, उसके बाद ही परियोजना का काम आगे बढ़ाया जाए। उनका आरोप है कि कई गांवों में लोगों को विस्थापन का डर सता रहा है और वर्षों पुरानी खेती-बाड़ी तथा आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। Ken Betwa Link Project
इसी मुद्दे को लेकर पिछले दिनों छतरपुर में कई प्रकार के विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। कहीं ग्रामीणों ने जल सत्याग्रह किया, तो कहीं महिलाओं और आदिवासी परिवारों ने प्रतीकात्मक चिता आंदोलन और फांसी के फंदे के साथ प्रदर्शन कर अपनी नाराज़गी जताई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि उनकी बात नहीं सुनी गई तो आंदोलन और व्यापक होगा।
हाल ही में प्रशासन ने प्रदर्शन स्थल को हटाने की कार्रवाई भी की। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया और कुछ लोगों को उनके गांव वापस भेजा। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा कारणों और हालात को देखते हुए यह कदम उठाया गया, जबकि आंदोलनकारियों ने इसे उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश बताया।
विशेषज्ञों का मानना है कि केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड के लिए पानी और सिंचाई के लिहाज़ से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण, वन क्षेत्र और स्थानीय समुदायों के पुनर्वास से जुड़े सवालों का समाधान भी उतना ही आवश्यक है। पर्यावरणविदों ने पहले भी जंगलों, वन्यजीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई है।

सरकारी पक्ष का कहना है कि परियोजना पूरी होने के बाद खेती, पेयजल और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी। वहीं आंदोलनकारी लगातार यह मांग दोहरा रहे हैं कि विकास के नाम पर किसी भी परिवार के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में विकास चाहती है तो प्रभावित लोगों को सम्मानजनक पुनर्वास और उचित मुआवज़ा पहले दिया जाए।
फिलहाल छतरपुर और पन्ना क्षेत्र में इस परियोजना को लेकर माहौल संवेदनशील बना हुआ है। प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की संभावनाएं बनी हुई हैं, लेकिन जब तक पुनर्वास और मुआवज़े से जुड़े विवाद पूरी तरह हल नहीं होते, तब तक यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना रह सकता है। आने वाले दिनों में सरकार और प्रभावित परिवारों के बीच होने वाली बातचीत पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी। Ken Betwa Link Project















