Jamiat Ulama-e-Hind News: नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना सैयद अरशद मदनी ने मस्जिदों और मदरसों से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखते हुए मुसलमानों से सब्र, एकता और हिकमत के साथ अपने दीन और ईमान पर कायम रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन इस्लाम को दुनिया की कोई ताकत मिटा नहीं सकी है और न भविष्य में मिटा सकेगी।
मौलाना अरशद मदनी के बयान में मस्जिदों की स्थिति, धार्मिक संस्थानों की भूमिका और नई पीढ़ी के ईमान की हिफाजत जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। उन्होंने कहा कि आज जिन मस्जिदों को शहीद किया जा रहा है, वे इंशाअल्लाह एक दिन फिर आबाद होंगी और वहां दोबारा अल्लाहु अकबर की सदाएं बुलंद होंगी।
उन्होंने मौजूदा हालात में मुसलमानों को निराश होने के बजाय हौसला बनाए रखने और अपने धार्मिक विश्वासों पर मजबूती से कायम रहने का संदेश दिया। साथ ही उन्होंने मदरसों के साथ माता-पिता की जिम्मेदारी को भी अहम बताया और कहा कि नई पीढ़ी की धार्मिक शिक्षा, आस्था और नैतिकता की हिफाजत केवल मदरसों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
मौलाना मदनी के बयान में धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थानों की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता भी सामने आई। उन्होंने मौजूदा सरकार पर मुसलमानों के साथ-साथ इस्लाम और धार्मिक संस्थानों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया। यह उनका राजनीतिक-सामाजिक आकलन है; इन आरोपों पर सरकार का पक्ष और अलग-अलग मामलों की कानूनी स्थिति भी महत्वपूर्ण है।
‘सरकारें आती-जाती हैं, इस्लाम हमेशा जिंदा रहेगा’
मौलाना अरशद मदनी ने अपने बयान में कहा कि सत्ता हमेशा किसी एक के पास नहीं रहती। सरकारें बदलती रहती हैं और समय के साथ सत्ता में बैठे लोग भी चले जाते हैं, लेकिन किसी धर्म की मौजूदगी को केवल सरकारी ताकत के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि मस्जिदों को शहीद किए जाने के बावजूद मुसलमानों को मायूस होने की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक, मस्जिदें फिर आबाद होंगी और वहां इबादत की आवाजें बुलंद होंगी। उन्होंने इस्लाम की ऐतिहासिक मौजूदगी का जिक्र करते हुए कहा कि इसे मिटाने की कोशिशें पहले भी हुईं, लेकिन इस्लाम आज भी कायम है।
मौलाना मदनी ने अपने बयान में सोवियत संघ के अंजाम का भी हवाला दिया। उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों को इतिहास से सबक लेने की बात कही और कहा कि इस्लाम को खत्म करने का सपना देखने वाले खुद इतिहास का हिस्सा बन गए, जबकि इस्लाम आज भी दुनिया में मौजूद है।
यहां सोवियत संघ का उल्लेख मौलाना मदनी की ओर से दी गई ऐतिहासिक मिसाल के तौर पर है। सोवियत संघ का विघटन 1991 में हुआ था। उसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कारण थे। इसलिए इस ऐतिहासिक घटना और मौलाना मदनी के धार्मिक संदेश को अलग-अलग संदर्भों में समझना जरूरी है। Jamiat Ulama-e-Hind News

मस्जिदों और धार्मिक स्थलों को लेकर मौलाना मदनी पहले भी चिंता जाहिर करते रहे हैं। जून 2026 में द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने उत्तराखंड के पिरान कलियर में जमीयत के एक कार्यक्रम के दौरान मस्जिदों और मदरसों पर बुलडोजर कार्रवाई की आलोचना की थी। उस समय उन्होंने नफरत के बजाय इंसाफ, मोहब्बत और आपसी भाईचारे को जरूरी बताया था।

मस्जिदों और मदरसों के मुद्दे पर उठाई आवाज..Jamiat Ulama-e-Hind News
मौलाना अरशद मदनी ने अपने बयान में आरोप लगाया कि पहले की सरकारें मुसलमानों को निशाना बनाती थीं, लेकिन मौजूदा सरकार के दौर में उनके मुताबिक इस्लाम, धार्मिक पहचान और धार्मिक संस्थानों को भी निशाना बनाया जा रहा है। Jamiat Ulama-e-Hind News
यह आरोप मौलाना मदनी की ओर से लगाया गया है। धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में संबंधित प्रशासन के आदेश, जमीन के रिकॉर्ड और अदालतों की कार्यवाही के आधार पर अलग-अलग तथ्यों को समझना भी जरूरी है।
सितंबर 2026 में सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में एक पुरानी मस्जिद के ध्वस्तीकरण का मामला चर्चा में आया था। इस मामले पर मौलाना अरशद मदनी ने कार्रवाई पर सवाल उठाए और समान न्याय की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में कानून और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सभी पक्षों के लिए समान रूप से होना चाहिए। इस मामले में प्रशासनिक कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों को अलग से देखना जरूरी है।
धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद केवल आस्था तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनमें जमीन के दस्तावेज, प्रशासनिक आदेश और न्यायिक प्रक्रिया जैसे पहलू भी शामिल हो सकते हैं। ऐसे मामलों में किसी भी दावे की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड और अदालत के आदेशों से की जानी चाहिए।
मौलाना मदनी का कहना है कि मस्जिदें और मदरसे मुसलमानों की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा हैं। उनके बयान का केंद्रीय संदेश यह है कि धार्मिक संस्थानों से जुड़े मामलों में इंसाफ, कानून और धार्मिक स्वतंत्रता के सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। Jamiat Ulama-e-Hind News
वहीं, किसी भी धार्मिक स्थल के संबंध में प्रशासनिक कार्रवाई की वजह और वैधानिकता को समझने के लिए संबंधित मामले के दस्तावेजों और आदेशों का अध्ययन जरूरी है। खबरों में आरोपों को आरोप के रूप में और पुष्ट तथ्यों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना ही सही पत्रकारिता है।
नई पीढ़ी के ईमान की हिफाजत में माता-पिता का भी अहम किरदार …Jamiat Ulama-e-Hind News
मौलाना अरशद मदनी ने अपने बयान में मदरसों की भूमिका के साथ-साथ माता-पिता की जिम्मेदारी पर भी खास जोर दिया। उन्होंने कहा कि मदारिसे इस्लामिया यानी इस्लामी मदरसे धर्म और ईमान के रक्षक तथा धार्मिक पहचान के अमानतदार हैं, लेकिन नई पीढ़ी के ईमान, आस्था और नैतिकता की हिफाजत केवल मदरसों की जिम्मेदारी नहीं है। Jamiat Ulama-e-Hind News
उनके मुताबिक, बच्चों की परवरिश और उनके भीतर अच्छे अखलाक पैदा करने में घर और परिवार का भी बड़ा योगदान होता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की शिक्षा, व्यवहार और धार्मिक समझ पर ध्यान दें। बच्चों को केवल स्कूल या मदरसे भेज देना काफी नहीं, बल्कि उनके साथ समय बिताना, उन्हें सही-गलत की समझ देना और अच्छे व्यवहार की तालीम देना भी जरूरी है।
आज के दौर में बच्चों के सामने पढ़ाई, रोजगार, तकनीक और सोशल मीडिया से जुड़ी कई चुनौतियां हैं। ऐसे माहौल में परिवार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों को अपनी धार्मिक परंपराओं से परिचित कराने के साथ-साथ दूसरों के प्रति सम्मान, जिम्मेदारी और अच्छे नागरिक बनने की सीख देना भी जरूरी है।
मौलाना मदनी के बयान में यह बात भी उभरकर सामने आई कि मदरसों और परिवारों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। मदरसे धार्मिक शिक्षा और नैतिक प्रशिक्षण में भूमिका निभाते हैं, जबकि घर में माता-पिता बच्चों के व्यवहार और रोजमर्रा की जिंदगी में इन मूल्यों को मजबूत कर सकते हैं।
उन्होंने मुसलमानों से मौजूदा परिस्थितियों में मायूस न होने की अपील की। उनके मुताबिक, सब्र, एकता, हिकमत और दृढ़ता के साथ अपने दीन और ईमान पर कायम रहना चाहिए। Jamiat Ulama-e-Hind News
कुल मिलाकर, मौलाना अरशद मदनी के बयान में तीन प्रमुख संदेश सामने आए हैं—मस्जिदों और धार्मिक संस्थानों से जुड़े मुद्दों पर चिंता, इस्लाम के भविष्य को लेकर धार्मिक विश्वास और नई पीढ़ी की परवरिश में माता-पिता की जिम्मेदारी। उन्होंने मुश्किल हालात में निराश होने के बजाय धैर्य, आपसी एकता और धार्मिक मूल्यों पर कायम रहने की बात कही।
संपादकीय नोट: मस्जिदों और धार्मिक संस्थानों को निशाना बनाए जाने संबंधी बातें मौलाना अरशद मदनी के आरोप और विचार हैं। खबर में उन्हें उन्हीं के बयान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। किसी विशेष घटना की कानूनी स्थिति के लिए संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड और अदालत के आदेश देखे जाने चाहिए। Jamiat Ulama-e-Hind News
Sources: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस , WebIndia123 / ANI ,अमर उजाला














