LPG Price Hike Again : देश में पढ़ाई या रोज़गार के लिए घर से दूर रहने वाले लाखों छात्रों और प्रवासी मजदूरों के लिए 5 किलो वाला “छोटू” गैस सिलेंडर किसी सहारे से कम नहीं माना जाता। यही सिलेंडर छोटे कमरों, किराए के मकानों और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों की रसोई चलाता है। लेकिन पिछले दो महीनों में इस छोटे सिलेंडर की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने गरीब और मध्यम वर्ग की चिंता बढ़ा दी है।
मीडिया रिपोर्ट्स और तेल कंपनियों के ताज़ा रेट के मुताबिक अप्रैल 2026 में 5 किलो फ्री ट्रेड एलपीजी (FTL) सिलेंडर के दाम में 51 रुपये की बढ़ोतरी हुई थी। इसके बाद 1 मई 2026 को इस सिलेंडर की कीमत में एक बड़ा उछाल आया और करीब 261 रुपये का इजाफा किया गया। अब 1 जून 2026 से फिर 11 रुपये की बढ़ोतरी लागू कर दी गई है। दिल्ली में 5 किलो FTL सिलेंडर की कीमत अब 821.50 रुपये तक पहुंच गई है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सिर्फ सरकारी तय रेट हैं। कई शहरों में प्रवासी मजदूर और छात्र स्थानीय बाजार या छोटे विक्रेताओं से गैस भरवाते हैं, जहां कीमतें अक्सर सरकारी रेट से भी ज्यादा वसूली जाती हैं। ऐसे में पहले से महंगाई, किराया और रोजमर्रा के खर्चों से जूझ रहे लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 5 किलो वाला छोटू सिलेंडर मुख्य रूप से उन्हीं लोगों के लिए लाया गया था जिनके पास स्थानीय पते का प्रमाण नहीं होता या जिनकी गैस खपत कम होती है। इसमें बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर, छात्र और छोटे कारोबार करने वाले लोग शामिल हैं।
1 मई को कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों के साथ-साथ 5 किलो FTL सिलेंडरों में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। उस समय सरकार ने घरेलू 14.2 किलो वाले सब्सिडी और सामान्य घरेलू सिलेंडरों के दाम स्थिर रखे थे, लेकिन छोटे और कमर्शियल उपयोग वाले सिलेंडरों पर बोझ बढ़ गया।
इस बीच 1 जून से एक बार फिर कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर महंगे हुए हैं और 5 किलो FTL सिलेंडर पर भी 11 रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी लागू हुई है। हालांकि घरेलू एलपीजी सिलेंडरों के दाम में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज़ हो गई है। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में रहने वाले लाखों छात्र और मजदूर आखिर बढ़ती महंगाई के बीच दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कैसे कर रहे हैं। खासकर तब, जब उनकी आमदनी में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है जितनी तेजी से जरूरी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं।
2 जून के राजनीतिक और सामाजिक माहौल के बीच यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसका सीधा असर देश के उस वर्ग पर पड़ रहा है जो रोज़ कमाता है और रोज़ खर्च करता है।

