FCRA Bill Opposition: RozTakNews
नई दिल्ली। विदेशी फंडिंग को लेकर केंद्र सरकार की ओर से लाया गया Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 यानी FCRA संशोधन विधेयक अब संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया है। बुधवार, 12 अगस्त को लोकसभा में इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार हंगामा हुआ। विपक्षी दलों ने विधेयक के कई प्रावधानों पर एतराज जताते हुए सरकार की नीयत और संभावित असर पर सवाल उठाए।
इस पूरे विवाद के बीच कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने भी FCRA बिल को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि इस बिल से सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं और पूछा कि क्या सरकार की पसंद-नापसंद के आधार पर संस्थाओं को काम दिया जाएगा। उन्होंने पारदर्शिता और समान अवसर को लेकर भी सवाल उठाया है।
सरकार की ओर से बिल को राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता और विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने की जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के उन आरोपों को खारिज किया कि विधेयक किसी खास समुदाय या अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। सरकार का कहना है कि FCRA का मकसद विदेशी चंदे की निगरानी और उसके सही इस्तेमाल को सुनिश्चित करना है।
विपक्ष का हंगामा, सरकार बोली- JPC में होगी पूरी जांच
FCRA Amendment Bill को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। अब सरकार ने इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने का फैसला किया है, ताकि प्रस्तावित बदलावों पर विस्तार से विचार किया जा सके और सांसदों से सुझाव लिए जा सकें। FCRA Bill Opposition
संसद में बिल को लेकर विपक्ष का विरोध केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके समेत विपक्षी दलों के नेताओं ने विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठाए। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे अल्पसंख्यकों और गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए परेशानी बढ़ाने वाला बताया। वहीं केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विधेयक का मकसद किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं बल्कि देश की सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़े पहलुओं को मजबूत करना है।

JPC के पास भेजे जाने से अब बिल पर विस्तृत संसदीय जांच का रास्ता खुल गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि विधेयक कानून बन गया है। समिति इसके प्रावधानों की जांच करेगी, संबंधित पक्षों से राय ले सकती है और अपनी रिपोर्ट संसद के सामने रखेगी। इसके बाद विधेयक की आगे की संसदीय प्रक्रिया होगी।
यही वजह है कि इस वक्त FCRA बिल को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सरकार इसे accountability और national interest से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष को आशंका है कि नए अधिकारों का इस्तेमाल संस्थाओं पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।
बिल के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक इसका एक अहम हिस्सा उन संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और संपत्तियों से संबंधित है, जिनका FCRA प्रमाणपत्र खत्म हो जाता है, रद्द हो जाता है या जिसका नवीनीकरण नहीं होता। प्रस्ताव में ऐसी परिस्थितियों में विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियों के vesting, supervision, management and disposal के लिए एक Designated Authority का ढांचा बनाने का प्रस्ताव है।
यही प्रावधान विपक्ष और नागरिक समाज से जुड़े कई लोगों की चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है।

.इकरा हसन का सवाल- पसंद और नापसंद के आधार पर चलेगी व्यवस्था? FCRA Bill Opposition
सपा सांसद इकरा हसन ने FCRA बिल को लेकर सरकार से सीधा सवाल किया है। उनके मुताबिक इस कानून से सरकार की मंशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार की पसंद-नापसंद के आधार पर संस्थाओं को काम करने का मौका मिलेगा और क्या यह व्यवस्था वास्तव में पारदर्शिता तथा समान अवसर के लिए है या फिर चुनिंदा संस्थाओं को बढ़ावा देने का रास्ता बनेगी। FCRA Bill Opposition
इकरा हसन की यह आपत्ति ऐसे समय आई है जब संसद में FCRA बिल पर सरकार और विपक्ष के बीच बहस काफी तेज है। विपक्ष का कहना है कि किसी भी कानून में सरकार को दिए जाने वाले अधिकारों के साथ स्पष्ट नियम, जवाबदेही और अपील की मजबूत व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि किसी संस्था के खिलाफ कार्रवाई मनमाने तरीके से न हो सके।
दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग कोई सामान्य आर्थिक गतिविधि भर नहीं है। देश के बाहर से आने वाले धन का इस्तेमाल अगर गलत मकसद के लिए किया जाता है तो इसका असर राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और देश के हितों पर पड़ सकता है। मौजूदा FCRA कानून भी विदेशी योगदान को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है।
PRS Legislative Research के मुताबिक FCRA का मूल उद्देश्य विदेशी योगदान को स्वीकार करने और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना है, ताकि ऐसी धनराशि से राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल असर न पड़े। प्रस्तावित 2026 संशोधन में सरकार ने विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर मौजूदा कानूनी व्यवस्था में मौजूद कुछ खामियों को दूर करने की बात कही है। FCRA Bill Opposition
यानी विवाद का असल सवाल यह है कि विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण जरूरी है या नहीं, इस पर शायद बहुत कम मतभेद हैं; असली बहस इस बात पर है कि नियंत्रण की सीमा क्या हो और सरकार को कितनी ताकत दी जाए।
इकरा हसन का सवाल इसी बिंदु पर केंद्रित दिखाई देता है। यदि कोई संस्था नियम तोड़ती है, विदेशी फंड का गलत इस्तेमाल करती है या कानून का उल्लंघन करती है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन अगर किसी संस्था का काम कानूनी है तो उसके साथ समान व्यवहार और पारदर्शी प्रक्रिया भी जरूरी है।
सरकार का तर्क बनाम विपक्ष की आशंका, अब JPC की परीक्षा
FCRA बिल में कई अहम बदलाव प्रस्तावित हैं। बिल के Statement of Objects and Reasons के अनुसार सरकार विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटान के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करना चाहती है। इसमें कुछ मामलों में संपत्तियों के अस्थायी या स्थायी रूप से Designated Authority के अधीन जाने का प्रावधान प्रस्तावित है। साथ ही prior permission के तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने और इस्तेमाल करने के लिए समय-सीमा तय करने तथा दंड के प्रावधानों को तर्कसंगत बनाने की बात भी कही गई है। FCRA Bill Opposition
बिल में जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति से जुड़ा बदलाव भी प्रस्तावित है। यानी सरकार का दावा है कि मौजूदा व्यवस्था में मौजूद कानूनी और प्रशासनिक अस्पष्टताओं को दूर किया जाएगा। FCRA Bill Opposition
लेकिन विपक्ष की चिंता यह है कि जिन संस्थाओं की गतिविधियां शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा, धार्मिक सेवा या दूसरे सार्वजनिक कार्यों से जुड़ी हैं, उनके लिए FCRA की प्रक्रिया पहले से ही संवेदनशील विषय है। यदि किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन खत्म होता है तो उसकी संपत्ति के संबंध में नए अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह होगा, यह सवाल महत्वपूर्ण है।
इसीलिए JPC की भूमिका अब काफी अहम हो गई है। समिति के सामने यह चुनौती होगी कि वह सरकार के तर्क और विपक्ष की आशंकाओं दोनों को सुने और कानून को ऐसा रूप देने की कोशिश करे जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुरक्षित रहे और संस्थाओं के साथ निष्पक्षता भी कायम रहे।
इस बीच तमिलनाडु विधानसभा ने भी FCRA Amendment Bill को मौजूदा रूप में वापस लेने की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया है। इससे साफ है कि विधेयक का विवाद केवल संसद तक सीमित नहीं है बल्कि राज्यों और विभिन्न संगठनों में भी इसे लेकर चर्चा चल रही है।
सवाल यह भी है कि विदेशी फंडिंग के नाम पर होने वाली गड़बड़ियों को रोकने के लिए सख्त कानून जरूरी है, लेकिन उस सख्ती के साथ पारदर्शिता, समान अवसर और निष्पक्ष अपील व्यवस्था कितनी मजबूत होगी?
यही वह बिंदु है जहां इकरा हसन समेत विपक्षी सांसद सरकार से जवाब मांग रहे हैं। वहीं सरकार कह रही है कि JPC के पास भेजे जाने के बाद सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा सकता है।FCRA Bill Opposition
अब निगाहें संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट पर रहेंगी। यदि समिति सरकार के प्रस्तावों में जरूरी सुधार सुझाती है तो बिल को लेकर पैदा हुई कई चिंताओं का समाधान हो सकता है। अगर विपक्ष की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया तो संसद के अगले चरण में राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
फिलहाल इतना साफ है कि FCRA Amendment Bill 2026 ने विदेशी फंडिंग, सरकारी अधिकार, संस्थाओं की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर देश में एक बड़ी बहस शुरू कर दी है। JPC के पास जाना इस बहस का अंत नहीं बल्कि असल संसदीय जांच की शुरुआत है।
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Sources : Economic Times , Navbharat Times , Iqra Hasan का X पोस्ट














