UPI Tax: RozTakNews
नई दिल्ली।संसद ने Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 को मंजूरी दे दी है। बिल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा डिजिटल पेमेंट और खास तौर पर UPI पर संभावित Merchant Discount Rate (MDR) को लेकर हो रही है। आम लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठा है कि क्या अब चाय बेचने वाले, सब्जी विक्रेता, ऑटो चालक, टैक्सी चालक और छोटे दुकानदारों से भी UPI भुगतान पर कोई शुल्क लिया जाएगा?
इसी मुद्दे को लेकर आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि वित्त मंत्री ने अपने बयान में एक ओर कहा कि UPI पर शुल्क लगाने के बारे में फैसला करने के लिए समिति बनाई जाएगी, जबकि दूसरी ओर सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि छोटे कारोबारियों और आम उपभोक्ताओं पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा।
संजय सिंह का कहना है कि उन्होंने बिल को पढ़ा है और उसमें ऐसी साफ व्यवस्था दिखाई नहीं देती, जिसमें चाय बेचने वाले, टैक्सी चालक, ऑटो चालक या सब्जी विक्रेता के UPI भुगतान को स्थायी रूप से शुल्क से बाहर रखने की बात लिखी हो। उनका सवाल है कि अगर सरकार की नीति छोटे कारोबारियों को राहत देने की है तो इसे कानून में स्पष्ट तौर पर क्यों नहीं लिखा गया?

हालांकि सरकार की ओर से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में साफ किया कि बिल अपने आप UPI भुगतान पर कोई टैक्स या ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लगाता। उन्होंने यह भी कहा कि उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों पर MDR लगाने का सवाल फिलहाल लागू नहीं किया गया है।
बिल पास, लेकिन UPI शुल्क पर बहस बरकरार
Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 को लोकसभा ने पहले मंजूरी दी थी। इसके बाद 10 अगस्त को राज्यसभा में भी इस पर चर्चा हुई और बिल लोकसभा को वापस भेज दिया गया, जिसके बाद संसद से इसकी मंजूरी पूरी हुई। सरकारी प्रसारण सेवा के अनुसार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बिल पेश किया था और इसमें Payment and Settlement Systems Act, 2007 समेत कई कानूनों में बदलाव किए गए हैं। UPI Tax
इस बिल का मकसद केवल UPI से जुड़ा बदलाव नहीं है। इसमें टैक्स व्यवस्था में कई संशोधन, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और निवेश के माहौल को बेहतर बनाने से जुड़े प्रावधान भी हैं। लेकिन राजनीतिक बहस में UPI का मुद्दा सबसे ज्यादा उभरकर सामने आया है।
असल विवाद इस बात को लेकर है कि UPI पर MDR लगाने की कानूनी गुंजाइश पैदा की गई है। फिलहाल UPI भुगतान आम तौर पर बिना किसी MDR के चलता है। नए कानूनी प्रावधानों से भविष्य में सरकार को निर्धारित डिजिटल भुगतान माध्यमों पर शुल्क की अनुमति देने का रास्ता मिलता है। इसका मतलब यह नहीं है कि बिल पास होते ही हर UPI भुगतान पर शुल्क लग गया है।
संजय सिंह ने उठाया छोटे दुकानदारों का सवाल
संजय सिंह ने सरकार की घोषणा और बिल की भाषा के बीच अंतर का सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि अगर सरकार यह कह रही है कि चाय वाले, सब्जी बेचने वाले, ऑटो चालक और छोटे व्यापारी प्रभावित नहीं होंगे तो इसकी स्पष्ट गारंटी कानून या नियमों में दिखाई देनी चाहिए। UPI Tax
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में UPI ने छोटे कारोबार की तस्वीर बदल दी है। शहरों से लेकर गांवों तक चाय की दुकान, फल-सब्जी की रेहड़ी, मेडिकल स्टोर, किराना दुकान और छोटी सर्विस की दुकानों पर QR कोड दिखाई देता है।
कई जगह ग्राहक जेब में नकद रखने के बजाय मोबाइल से भुगतान करते हैं। ऐसे में यदि भविष्य में किसी भी तरह का शुल्क लागू होता है तो छोटे कारोबारियों के सामने यह सवाल खड़ा होगा कि उसका बोझ कौन उठाएगा—दुकानदार या ग्राहक?
सरकार का जवाब—अभी कोई UPI टैक्स नहीं
सरकार ने इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि बिल UPI उपयोगकर्ताओं पर कोई टैक्स या तत्काल ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लगाता। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों को MDR के बोझ से बचाया जाएगा। UPI Tax
यानी अभी किसी व्यक्ति को ₹100, ₹500 या ₹1,000 का UPI भुगतान करने पर सरकार को अलग से टैक्स देने की व्यवस्था लागू नहीं हुई है।
यहां Tax और MDR के बीच फर्क समझना भी जरूरी है। टैक्स सरकार द्वारा लगाया जाता है, जबकि MDR डिजिटल भुगतान की प्रोसेसिंग से जुड़ा शुल्क है, जिसे भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंक या सेवा प्रदाता व्यापारी से ले सकता है। इसी अंतर को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और आम लोगों की चिंता बढ़ी है।
क्या UPI भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेगा?
सरकार का मौजूदा रुख यही है कि आम उपभोक्ता के लिए UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। लेकिन बिल ने भविष्य में MDR से संबंधित व्यवस्था के लिए कानूनी रास्ता जरूर तैयार किया है। यही वह बिंदु है जिस पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। UPI Tax
रिपोर्टों के मुताबिक संभावित MDR को लेकर अलग-अलग मॉडल पर चर्चा हुई है। इनमें बड़े कारोबारियों और ज्यादा मूल्य वाले लेनदेन को लक्ष्य बनाने की संभावना बताई गई है। कुछ रिपोर्टों में ₹2,000 से अधिक के लेनदेन और बड़े व्यापारियों को संभावित दायरे में रखने की बात सामने आई है, लेकिन अंतिम शुल्क व्यवस्था सरकार द्वारा अभी तय नहीं की गई है।
इसका मतलब यह है कि सोशल मीडिया पर चल रही ऐसी बातें कि “अब हर UPI भुगतान पर टैक्स लगेगा”, मौजूदा स्थिति को सही तरीके से पेश नहीं करतीं।
छोटे कारोबारियों पर असर क्यों बड़ा हो सकता है?
भारत में डिजिटल पेमेंट का विस्तार केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे दुकानदार भी अब डिजिटल भुगतान को अपने कारोबार का अहम हिस्सा मानते हैं। UPI Tax
एक चाय विक्रेता के लिए ₹20 या ₹30 का भुगतान भी डिजिटल हो सकता है। सब्जी विक्रेता के पास ग्राहक ₹80 या ₹150 का भुगतान QR कोड से कर सकता है। ऑटो चालक को ₹200 या ₹300 मिल सकते हैं। UPI Tax
अगर ऐसे छोटे भुगतान पर शुल्क लगाया जाए तो प्रति लेनदेन रकम भले छोटी हो, लेकिन लगातार बड़ी संख्या में भुगतान होने के कारण दुकानदार की लागत बढ़ सकती है।
यही वजह है कि सरकार की ओर से छोटे कारोबारियों को राहत देने की बात को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़
UPI ने भारत में डिजिटल भुगतान को बेहद आसान बनाया है। आज व्यक्ति बैंक खाते से सीधे दूसरे व्यक्ति या व्यापारी को कुछ सेकंड में भुगतान कर सकता है। UPI Tax
आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में UPI ने रिकॉर्ड स्तर पर लेनदेन संभाले। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत में UPI का इस्तेमाल खुदरा डिजिटल भुगतान में बेहद बड़ा हिस्सा बन चुका है।
इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यही माना जाता है कि ग्राहक को अलग से भुगतान शुल्क नहीं देना पड़ता और छोटे व्यापारी भी बिना कार्ड मशीन के QR कोड के जरिए पैसा स्वीकार कर सकते हैं।
इसीलिए UPI शुल्क का मुद्दा सिर्फ बैंकिंग या टेक्नोलॉजी का सवाल नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी और छोटे कारोबार से भी जुड़ा हुआ है।
विपक्ष का सवाल—बयान नहीं, लिखित गारंटी चाहिए
संजय सिंह के बयान का मूल सवाल यही है कि अगर सरकार छोटे व्यापारियों को शुल्क से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसकी स्पष्ट व्यवस्था कहां है? UPI Tax
विपक्ष का कहना है कि सरकार को केवल बयान देकर नहीं बल्कि कानून और नियमों में साफ शब्दों में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छोटे व्यापारी और आम नागरिक किसी नए शुल्क के बोझ में न आएं।
दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि बिल को UPI पर टैक्स लगाने वाले कानून के तौर पर देखना गलत है। सरकार के मुताबिक मौजूदा बिल डिजिटल भुगतान व्यवस्था में भविष्य की जरूरतों के लिए कानूनी ढांचा तैयार करता है, जबकि तत्काल किसी शुल्क की घोषणा नहीं हुई है।
RBI गवर्नर भी बता चुके हैं लागत का सवाल
UPI शुल्क की बहस के बीच RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी डिजिटल भुगतान के खर्च को लेकर कहा था कि भुगतान व्यवस्था को चलाने की लागत किसी न किसी रूप में अर्थव्यवस्था में आती है। उन्होंने UPI को एक सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह बताते हुए कहा कि इसके संचालन और विस्तार के लिए संसाधनों की जरूरत होती है। UPI Tax
यही असल आर्थिक सवाल है—UPI जैसी विशाल डिजिटल व्यवस्था को लंबे समय तक मुफ्त कैसे रखा जाए और उसका खर्च कौन उठाए?
सरकार को एक ओर डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना है और दूसरी ओर बैंक, पेमेंट कंपनियों तथा तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत का भी ध्यान रखना है।
सियासत गरम, जनता को जवाब चाहिए
UPI शुल्क का मुद्दा अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है। विपक्ष सरकार से लिखित आश्वासन मांग रहा है, जबकि सरकार यह कह रही है कि आम नागरिकों और छोटे कारोबारियों को तत्काल कोई शुल्क नहीं देना होगा। साफ है कि बहस सिर्फ आज के शुल्क पर नहीं बल्कि भविष्य की डिजिटल पेमेंट पॉलिसी पर भी है। UPI Tax
अगर भविष्य में MDR लागू किया जाता है तो सरकार को यह तय करना होगा कि कौन-से व्यापारी इसके दायरे में आएंगे, कितनी रकम पर शुल्क लगेगा और क्या छोटे दुकानदारों को पूरी तरह छूट मिलेगी।
यही वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले समय में सबसे ज्यादा अहम होगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 पास हो चुका है, लेकिन इससे हर UPI भुगतान पर तत्काल टैक्स लागू नहीं हुआ है। वित्त मंत्री ने उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों को राहत की बात कही है, जबकि संजय सिंह जैसे विपक्षी नेता बिल की भाषा और सरकार के बयान के बीच स्पष्टता की मांग कर रहे हैं। UPI Tax
आम आदमी के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि अफवाह और हकीकत में फर्क किया जाए। अभी UPI भुगतान पर कोई नया सामान्य टैक्स लागू नहीं हुआ है। भविष्य में MDR से जुड़ा कोई फैसला होता है तो उसकी दर, दायरा और किन लोगों को छूट मिलेगी—इन सबकी जानकारी सरकारी अधिसूचना से ही स्पष्ट होगी UPI Tax
Sources: Reuters , Times of India Economic time, The Tribune














