Amit Shah UCC Announcement: नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) को लेकर देश की सियासत में एक बार फिर गर्मी बढ़ गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा नेतृत्व वाले NDA के शासन वाले सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। शाह ने कहा कि कई राज्यों में इसकी शुरुआत हो चुकी है और आने वाले समय में इसे NDA शासित अन्य राज्यों तक ले जाया जाएगा।
UCC का मकसद विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे कुछ व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए धर्म से अलग एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। फिलहाल भारत में इन मामलों के लिए अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानून और सामान्य नागरिक कानून दोनों मौजूद हैं।
उत्तराखंड इस मामले में सबसे आगे है। राज्य विधानसभा ने 2024 में UCC कानून पारित किया और राज्य में इसे जनवरी 2025 से लागू किया गया। उत्तराखंड सरकार के आधिकारिक पोर्टल के मुताबिक UCC विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढांचे के तहत रेगुलेट करता है।
अमित शाह के ताजा बयान के बाद अब सवाल केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बहस 21 NDA शासित राज्यों तक पहुंच गई है। हालांकि इन राज्यों में कानून लागू करने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में कानून या बिल की स्थिति अलग-अलग है और कई जगह अभी विधायी या प्रशासनिक प्रक्रिया बाकी है।

जमीयत की याचिका और हाईकोर्ट में संवैधानिक बहस
UCC को लेकर सबसे अहम कानूनी लड़ाइयों में से एक उत्तराखंड हाईकोर्ट में चल रही है। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने फरवरी 2025 में उत्तराखंड में लागू UCC को चुनौती देते हुए नैनीताल हाईकोर्ट का रुख किया था। संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी की है। Amit Shah UCC Announcement
जमीयत का कहना है कि UCC के कुछ प्रावधान मुस्लिम पर्सनल लॉ और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं। संगठन ने अदालत में यह सवाल भी उठाया कि क्या राज्य सरकार को इस तरह की समान नागरिक संहिता बनाने और लागू करने का संवैधानिक अधिकार हासिल है।
फरवरी 2025 में हुई सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 और राज्य की विधायी शक्ति से जुड़े सवाल अदालत के सामने रखे थे। उन्होंने यह दलील भी दी कि कानून मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। Amit Shah UCC Announcement
जमीयत अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भी UCC का विरोध करते हुए कहा था कि संगठन संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन को कायम रखने के लिए अदालत गया है। उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय अपने धार्मिक और पारिवारिक मामलों में शरीयत के अनुरूप व्यवस्था को महत्वपूर्ण मानता है।
यहां यह फर्क समझना जरूरी है कि जमीयत की ओर से UCC को धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के लिए खतरा बताया जा रहा है, जबकि सरकार UCC को समान नागरिक अधिकार और समान कानूनी व्यवस्था से जोड़कर पेश करती है। इसलिए इन दोनों दावों को अदालत में कानूनी दलीलों और संविधान की व्याख्या के आधार पर परखा जाना है। Amit Shah UCC Announcement
मामले में केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ ही मुद्दा नहीं है। असल बहस यह भी है कि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों पर कानून बनाने की शक्ति केंद्र और राज्यों के बीच किस तरह बंटी हुई है और राज्य द्वारा बनाए गए UCC की संवैधानिक सीमा क्या है।
UCC, धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान पर बड़ी बहस Amit Shah UCC Announcement
UCC को लेकर संविधान का अनुच्छेद 44 भी लगातार चर्चा में रहता है। अनुच्छेद 44 में राज्य के लिए नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास, करने की बात कही गई है। दूसरी तरफ अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। Amit Shah UCC Announcement
यही वजह है कि UCC की बहस में दो संवैधानिक पहलू आमने-सामने दिखाई देते हैं—एक तरफ समान नागरिक कानून की संवैधानिक परिकल्पना और दूसरी तरफ मौलिक अधिकारों में शामिल धार्मिक स्वतंत्रता।
हालांकि यह कहना कि UCC लागू होते ही धार्मिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी, एक राजनीतिक और कानूनी निष्कर्ष है, जिसे अदालत ने पूरे देश के लिए अभी घोषित नहीं किया है। धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा और UCC के किसी विशेष प्रावधान का उस पर असर अदालत में मामले-दर-मामले तय हो सकता है। Amit Shah UCC Announcement
उत्तराखंड के UCC कानून में अनुसूचित जनजातियों को स्पष्ट छूट दी गई है। आधिकारिक कानून में कहा गया है कि अनुसूचित जनजातियों और संविधान के भाग XXI के तहत संरक्षित कुछ customary rights वाले लोगों पर यह कानून लागू नहीं होगा।
यही छूट UCC पर बहस का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। जमीयत और UCC के अन्य आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि यदि कुछ समुदायों की विशिष्ट परंपराओं के लिए संवैधानिक संरक्षण के आधार पर अलग व्यवस्था संभव है तो धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के साथ किस तरह संतुलन बनाया जाएगा। दूसरी तरफ UCC के समर्थक इसे अलग संवैधानिक प्रावधानों और जनजातीय अधिकारों के संदर्भ में देखते हैं।
सरकार की ओर से UCC को लैंगिक समानता और समान नागरिक अधिकारों के नजरिए से भी पेश किया जा रहा है। अमित शाह ने अपने हालिया बयान में तीन तलाक पर रोक समेत कई सुधारों का जिक्र करते हुए UCC को समान अधिकारों से जोड़ा। Amit Shah UCC Announcement
वहीं UCC के आलोचक कहते हैं कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू करने के तरीके के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि सुधार की प्रक्रिया में संबंधित समुदायों, धार्मिक संस्थाओं, महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों से व्यापक मशविरा होना चाहिए।
इस बहस का एक और पहलू यह है कि भारत जैसे विविध देश में व्यक्तिगत कानूनों की ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि अलग-अलग रही है। UCC का लागू होना विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े रोजमर्रा के मामलों पर सीधा असर डाल सकता है। इसलिए इसके प्रावधानों और उनके व्यावहारिक असर पर चर्चा महज सियासी नारे तक सीमित नहीं रह सकती।
राजनीतिक स्तर पर भी UCC को लेकर NDA के भीतर पूरी तरह एक जैसी राय दिखाई नहीं दे रही है। हालिया रिपोर्टों में जनता दल यूनाइटेड की ओर से बिहार में UCC को लेकर अलग रुख सामने आया है, जबकि कुछ अन्य NDA सहयोगियों ने इस मुद्दे पर समर्थन या विचार-विमर्श की जरूरत बताई है।
इससे साफ है कि 2029 से पहले 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी व्यापक बहस का विषय बनेगा। Amit Shah UCC Announcement
अब निगाहें उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाही पर भी हैं। जमीयत की याचिका में उठाए गए सवालों पर अदालत की व्याख्या आगे की UCC बहस के लिए अहम हो सकती है। फिलहाल अदालत ने UCC को देशभर में असंवैधानिक घोषित नहीं किया है और न ही जमीयत के सभी दावों को अंतिम रूप से स्वीकार किया गया है।
ऐसे में UCC पर आगे की तस्वीर कानून के वास्तविक प्रावधानों, राज्य सरकारों की विधायी प्रक्रिया, अदालतों की संवैधानिक व्याख्या और अलग-अलग समुदायों के साथ होने वाले मशविरे से तय होगी। एक तरफ सरकार समान नागरिक कानून को समानता और सुधार से जोड़ रही है, तो दूसरी तरफ जमीयत जैसे संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानूनों के अधिकार के संदर्भ में देख रहे हैं। फैसला आखिरकार संविधान, कानून और न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा। Amit Shah UCC Announcement
Sources: Times of India ,India Today , Uttarakhand UCC , अमर उजाला














