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UP Panchayat Election: UP पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट सख्त, योगी सरकार से मांगा जवाब

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UP Panchayat Election : प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान के मुताबिक त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल सिर्फ पांच साल का होता है और पांच साल पूरे होने से पहले नए चुनाव कराना सरकार की जिम्मेदारी है। किसी भी कानून, अध्यादेश या सरकारी आदेश के जरिए पंचायत चुनाव को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।


जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के 25 और 26 मई के उन आदेशों पर गंभीर सवाल उठाए, जिनमें पंचायत चुनाव टालने और मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक के तौर पर काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने पहली नजर में माना कि यह फैसला संविधान की भावना के खिलाफ दिखाई देता है।


सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही यूपी पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) को संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K के खिलाफ मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर चुकी है। ऐसे में उसी प्रावधान के आधार पर चुनाव टालना उचित नहीं माना जा सकता।


दूसरी ओर, राज्य निर्वाचन आयोग ने कोर्ट को बताया कि आयोग पूरी तरह चुनाव कराने के लिए तैयार है। 10 जून को मतदाता सूची भी प्रकाशित की जा चुकी है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से जरूरी प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिसकी वजह से चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

राज्य सरकार की तरफ से दलील

राज्य सरकार की तरफ से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार OBC आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया है। जब तक आयोग अपनी रिपोर्ट नहीं देता, तब तक पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं होगा।


इस पर हाईकोर्ट ने हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर इतने लंबे समय के बाद भी OBC आयोग अपनी रिपोर्ट क्यों पेश नहीं कर पाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आयोग को भी इस मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी, ताकि पूरी स्थिति साफ हो सके।


कोर्ट ने सरकार को आखिरी मौका देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा कि सरकार को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि पंचायत चुनाव आखिर कब तक कराए जाएंगे। केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा, बल्कि निश्चित समयसीमा भी बतानी होगी।


हाईकोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर अगली सुनवाई तक सरकार समयसीमा और OBC आयोग की रिपोर्ट पेश नहीं करती, तो पंचायती राज विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना पड़ेगा। उन्हें हलफनामे के जरिए यह भी बताना होगा कि जब संबंधित कानून पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका था, तब उसके आधार पर आदेश किस वजह से जारी किए गए।


कोर्ट ने साफ संकेत दिए कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो इसे अदालत के आदेश की अवमानना माना जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को तय की गई है। अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार अदालत के सामने क्या जवाब देती है और पंचायत चुनाव की नई तारीख कब घोषित होती है।UP Panchayat Election

Azmatulla

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