होमदेश विदेश उत्तर प्रदेश क्रिकेट बॉलीवुडमिडिल ईस्ट तकनीक राजनितिक Web Stories
---Advertisement---

Taliban Victory Day: दिल्ली में तालिबान का ‘विक्ट्री डे’, भारतीय अफसरों की मौजूदगी से मची सियासी हलचल

---Advertisement---

HIGHLIGHTS

  • दिल्ली में 15 अगस्त को तालिबान का Victory Day कार्यक्रम।
  • भारतीय अधिकारियों की मौजूदगी की संभावना से बढ़ी हलचल।
  • 2021 में काबुल पर कब्जे के पांच साल पूरे।

Taliban Victory Day: नई दिल्ली। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी को पांच साल पूरे होने पर 15 अगस्त 2026 को ‘विक्ट्री डे’ के तौर पर मनाया जा रहा है। इसी सिलसिले में नई दिल्ली स्थित अफगान मिशन में कार्यक्रम को लेकर भारत-अफगानिस्तान रिश्तों पर नई बहस छिड़ गई है। खबरों के मुताबिक भारतीय अधिकारियों के कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना है। यह घटनाक्रम ऐसे वक्त आया है जब नई दिल्ली और काबुल के बीच पिछले कुछ महीनों में pragmatic engagement यानी व्यावहारिक और जरूरत आधारित कूटनीतिक रिश्ते तेजी से आगे बढ़े हैं।

यहां एक जरूरी बात साफ करना भी जरूरी है। उपलब्ध ताजा रिपोर्टों और अफगानिस्तान के आधिकारिक छुट्टी कैलेंडर के मुताबिक Taliban Victory Day 15 अगस्त 2026 को है, 17 अगस्त को नहीं। 17 अगस्त 2025 को तुर्किये में अफगान दूतावास ने अलग से Victory Day कार्यक्रम किया था, जिससे तारीख को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।

भारत की तरफ से भी तालिबान के साथ रिश्तों को लेकर नीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। हालांकि भारत ने तालिबान सरकार को औपचारिक तौर पर मान्यता देने की घोषणा नहीं की है, लेकिन बातचीत, व्यापार, मानवीय मदद, वीजा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संपर्क बढ़ा है। भारतीय विदेश नीति के जानकार इसे ‘engagement without formal recognition’ की नीति के तौर पर देखते हैं।

2021 में काबुल पर कब्जे से शुरू हुआ नया अध्याय

15 अगस्त 2021 अफगानिस्तान के इतिहास में एक बेहद अहम तारीख बन गई। अमेरिकी और नाटो सेनाओं की वापसी के बीच तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और तत्कालीन अफगान सरकार का पतन हो गया। इसके साथ ही करीब दो दशक तक चले अमेरिकी सैन्य अभियान का अंत हुआ और अफगानिस्तान में तालिबान दोबारा सत्ता के केंद्र में आ गया। Taliban Victory Day

तालिबान का इतिहास इससे काफी पुराना है। 1990 के दशक में सोवियत सेना की वापसी और अफगान गृहयुद्ध के दौर में तालिबान एक ताकत के रूप में उभरा। 1996 में उसने काबुल पर कब्जा किया और 2001 तक अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर शासन किया। 2001 में अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य अभियान के बाद तालिबान सत्ता से बाहर हो गया, लेकिन संगठन ने करीब दो दशकों तक विद्रोही लड़ाई जारी रखी।

तालिबान समर्थक नैरेटिव में इस लंबे संघर्ष को विदेशी सैन्य मौजूदगी के खिलाफ ‘कुर्बानी’ और प्रतिरोध के तौर पर पेश किया जाता है। तालिबान के लोग हजारों लड़ाकों की मौत और वर्षों की लड़ाई को अपनी सफलता की बुनियाद बताते हैं। 2025 में तुर्किये स्थित अफगान दूतावास के Victory Day कार्यक्रम में भी तालिबान पक्ष ने इस दिन को अफगान लोगों के लंबे संघर्ष, सब्र और कुर्बानियों से जोड़ा था। Taliban Victory Day

लेकिन इस इतिहास का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। तालिबान के दो दशक लंबे संघर्ष के दौरान अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में आम नागरिक, अफगान सुरक्षाकर्मी और विदेशी सैनिक मारे गए। तालिबान के शासन को लेकर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार पर पाबंदियों, मानवाधिकारों और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आलोचना भी होती रही है। भारत की नीति में इसी वजह से व्यावहारिक संपर्क के साथ सावधानी भी बरकरार है।

यानी तालिबान की ‘कुर्बानी’ का जिक्र उसके अपने राजनीतिक नैरेटिव और लंबे युद्ध के संदर्भ में किया जा सकता है, लेकिन इसे एकतरफा गौरवगाथा मानना सही नहीं होगा। अफगानिस्तान की जनता ने इस संघर्ष की भारी कीमत भी चुकाई है।

भारत ने क्यों बदला रुख, रिश्तों में बढ़ी गर्माहट

तालिबान के 2021 में सत्ता में आने के बाद भारत ने शुरू में बेहद सतर्क नीति अपनाई। नई दिल्ली ने काबुल में अपनी राजनयिक मौजूदगी सीमित कर दी और अफगानिस्तान में मानवीय सहायता तथा भारतीय नागरिकों से जुड़े कामों पर फोकस रखा। Taliban Victory Day

लेकिन समय के साथ क्षेत्रीय हालात बदले। पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में तनाव बढ़ा, चीन का अफगानिस्तान में प्रभाव बढ़ा और भारत के सामने यह सवाल भी था कि अगर वह अफगानिस्तान से पूरी तरह दूरी बनाए रखता है तो वहां उसकी रणनीतिक मौजूदगी कमजोर हो सकती है।

2025 में तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा ने रिश्तों को नया मोड़ दिया। भारत ने उसी दौरान काबुल में अपनी तकनीकी मिशन को दूतावास के स्तर पर अपग्रेड करने की घोषणा की। भारत ने साफ किया कि अफगानिस्तान की संप्रभुता, विकास और क्षेत्रीय स्थिरता उसके लिए महत्वपूर्ण हैं।

2026 में भी यह प्रक्रिया आगे बढ़ी। इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स के मुताबिक अफगानिस्तान के लिए भारत की विकास सहायता 2026-27 के बजट में 100 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 150 करोड़ रुपये की गई। जनवरी 2026 में तालिबान द्वारा नामित मुफ़्ती नूर अहमद नूर ने नई दिल्ली में अफगान मिशन के प्रभारी के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।

भारत के लिए अफगानिस्तान केवल पड़ोसी क्षेत्र नहीं बल्कि मध्य एशिया तक पहुंच, चाबहार पोर्ट, आतंकवाद विरोधी सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन के लिहाज से अहम है। यही वजह है कि नई दिल्ली तालिबान से संपर्क बढ़ा रही है, मगर औपचारिक मान्यता का फैसला अभी भी अलग मुद्दा है।

भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते केवल सरकारों के बीच नहीं हैं। शिक्षा, इलाज, व्यापार, क्रिकेट, मानवीय सहायता और विकास परियोजनाओं के स्तर पर भी दोनों देशों के पुराने संबंध हैं। 2026 में अफगानिस्तान और भारत के बीच क्रिकेट रिश्ते भी मजबूत दिखाई दे रहे हैं। सितंबर में अफगानिस्तान भारत में भारत के खिलाफ तीन टी20 मैचों की सीरीज खेलेगा, क्योंकि मौजूदा सुरक्षा हालात में अफगानिस्तान के लिए अपने देश में बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबले आयोजित करना मुश्किल है।

‘विक्ट्री डे’ में भारतीय मौजूदगी के मायने क्या हैं? Taliban Victory Day

दिल्ली में तालिबान के Victory Day कार्यक्रम में भारतीय अधिकारियों की संभावित मौजूदगी को केवल एक समारोह में शिरकत के तौर पर देखना शायद अधूरा विश्लेषण होगा। इसके पीछे बदलती क्षेत्रीय कूटनीति की पूरी तस्वीर मौजूद है। Taliban Victory Day

भारत के लिए तालिबान के साथ संवाद का एक बड़ा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अफगान जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो। इसके अलावा भारतीय नागरिकों, व्यापारियों और छात्रों से जुड़े मसलों को सीधे उठाने के लिए भी काबुल से संवाद जरूरी है।

इसी संदर्भ में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के हवाले से सामने आया बयान महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पिछले महीनों और वर्षों में भारत के अफगानिस्तान के साथ कई स्तरों पर संपर्क रहे हैं। उन्होंने अफगानिस्तान से मंत्रिस्तरीय यात्राओं, विकास सहयोग, व्यापार और कनेक्टिविटी का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के अफगान लोगों के साथ लंबे समय से संबंध हैं और वह इन रिश्तों को और मजबूत करने की उम्मीद करता है।

यह रुख बताता है कि भारत तालिबान से दूरी बनाकर रखने के बजाय बातचीत के जरिए अपने हित सुरक्षित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि भारत तालिबान की हर नीति से सहमत है। महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार और नागरिक अधिकारों को लेकर तालिबान की नीतियां अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनी हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में भी इन पाबंदियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान द्वारा अपने राजनीतिक मिशन से जुड़े दो अफगान कर्मचारियों को हिरासत में लिए जाने पर चिंता जताई।

इसलिए भारत के सामने एक मुश्किल संतुलन है—एक तरफ अफगानिस्तान में अपने रणनीतिक और सुरक्षा हितों की हिफाजत, दूसरी तरफ तालिबान की विवादित नीतियों पर अपनी चिंताओं को कायम रखना।

यही वजह है कि दिल्ली का मौजूदा रुख ‘व्यावहारिक संपर्क, लेकिन बिना जल्दबाजी की औपचारिक मान्यता’ के रूप में देखा जा रहा है।

दिलचस्प बात यह भी है कि अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के पांच साल बाद अब क्षेत्रीय समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। पाकिस्तान और तालिबान के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं, चीन आर्थिक और रणनीतिक संपर्क बढ़ा रहा है और भारत भी अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है। ऐसे में काबुल अब दक्षिण एशिया की बड़ी भू-राजनीतिक बिसात का अहम हिस्सा बन चुका है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि तालिबान के साथ बढ़ता संपर्क भविष्य में किस मुकाम तक जाएगा। क्या यह केवल व्यापार और सुरक्षा तक सीमित रहेगा या आने वाले वक्त में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक रिश्तों की राह भी खुलेगी? Taliban Victory Day

फिलहाल तस्वीर साफ है—भारत तालिबान से संवाद बढ़ा रहा है, मगर अपनी कूटनीतिक सावधानी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। दिल्ली में Victory Day कार्यक्रम में भारतीय अधिकारियों की मौजूदगी इसी बदलती नीति का एक और संकेत मानी जा रही है।

और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है—अफगानिस्तान में सत्ता बदल चुकी है, लेकिन भारत के लिए अफगानिस्तान की अहमियत नहीं बदली। अब नई दिल्ली का मकसद यह है कि बदलती हुकूमत के साथ रिश्ते रखते हुए भारत की सुरक्षा, व्यापार, क्षेत्रीय प्रभाव और अफगान जनता के साथ पुराने रिश्ते भी सुरक्षित रहें। Taliban Victory Day

Sources: Times of India , Associated Press Retuer

Azmatulla

Hi, I am an experienced journalist and news writer with over 20 years of experience in the media industry. Throughout my career, I have worked with more than 15 Hindi and Urdu newspapers, covering a wide range of topics including politics, current affairs, national news, international developments, and social issues.With extensive experience in both print and digital journalism, I am committed to delivering accurate, reliable, and well-researched news to readers. My work focuses on presenting facts in a clear, balanced, and easy-to-understand manner while maintaining the highest standards of journalism.Over the years, I have contributed to numerous publications and continue to remain actively involved in both newspaper and digital media platforms. My goal is to keep readers informed with trustworthy news, meaningful analysis, and timely updates from around the world.

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment