Donald Trump India Tariff : वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump एक बार फिर अपने विवादित बयानों को लेकर चर्चा में हैं। एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ के संबंध में ट्रंप ने ऐसे आंकड़ों का इस्तेमाल किया जो आधिकारिक अमेरिकी आंकड़ों से मेल नहीं खाते थे। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप लगातार यह कहते रहे कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर 100 प्रतिशत से लेकर 175 प्रतिशत तक टैरिफ लगाता है, जबकि अमेरिकी व्यापार विभाग और अन्य आधिकारिक एजेंसियों के पास मौजूद आंकड़े इससे काफी अलग थे।
रिपोर्ट में बताया गया है कि एक अहम बैठक के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने ट्रंप के सामने वास्तविक व्यापारिक आंकड़े रखे, लेकिन उन्होंने उन आंकड़ों को मानने से इनकार कर दिया। बताया जाता है कि ट्रंप का मानना था कि भारत अमेरिकी कंपनियों और उत्पादों के साथ “अनुचित व्यवहार” कर रहा है और इसी आधार पर उन्होंने भारत के खिलाफ सख्त टैरिफ नीति की वकालत की।
जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे संवेदनशील विषयों में गलत या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए आंकड़े दोनों देशों के रिश्तों पर असर डाल सकते हैं। भारत और अमेरिका पिछले कई वर्षों से व्यापार समझौतों और बाजार पहुंच को लेकर बातचीत करते रहे हैं। ऐसे में यदि किसी देश के खिलाफ गलत आंकड़ों के आधार पर राय बनाई जाए तो उसका असर वैश्विक व्यापारिक माहौल पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक रिश्तों में से एक हैं। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का कारोबार होता है और तकनीक, ऊर्जा, रक्षा तथा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में तथ्यों के बजाय राजनीतिक बयानबाजी पर आधारित निर्णय निवेशकों और उद्योग जगत के लिए चिंता का विषय बन सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान टैरिफ को लेकर कई बार आक्रामक रुख अपनाया गया। हालांकि बाद में कई मामलों में बातचीत और समझौतों के जरिए तनाव कम करने की कोशिश भी हुई। लेकिन भारत के संदर्भ में टैरिफ आंकड़ों को लेकर उठे इस नए विवाद ने फिर से यह बहस छेड़ दी है कि क्या वैश्विक व्यापार नीति तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए या राजनीतिक धारणा पर।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला केवल भारत और अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि आधुनिक राजनीति में डेटा और तथ्यों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। यदि शीर्ष स्तर के नेता आधिकारिक आंकड़ों को नजरअंदाज करते हैं तो इससे नीति निर्माण की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि इस खुलासे ने अमेरिका के राजनीतिक और व्यापारिक गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
फिलहाल भारत की ओर से इस रिपोर्ट पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के दीर्घकालिक हित मजबूत आर्थिक सहयोग और तथ्य आधारित संवाद में ही निहित हैं। आने वाले समय में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं पर इस विवाद का कितना प्रभाव पड़ता है, इस पर सभी की नजरें बनी हुई हैं

