Mosque Demolition Controversy: सहारनपुर। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित पुरानी मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। प्रशासन की ओर से मस्जिद को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण बताते हुए कार्रवाई की गई, जबकि मुस्लिम पक्ष और विपक्षी नेताओं ने कार्रवाई की प्रक्रिया और उसकी टाइमिंग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसी बीच कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने सहारनपुर पहुंचकर प्रशासन पर बड़ा आरोप लगाया है।
इकरा हसन का कहना है कि जिला अदालत के आदेश के बाद भी कानूनी रास्ता खुला हुआ था और करीब 22 दिन का समय बाकी था। उनका दावा है कि मुस्लिम पक्ष हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन इससे पहले ही प्रशासन ने मस्जिद को गिरा दिया। इकरा हसन ने यह भी सवाल उठाया कि अगर अदालत ने सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं दिया था तो फिर इतनी जल्दबाजी में बुलडोजर क्यों चलाया गया?
हालांकि, इस पूरे मामले में प्रशासन का पक्ष अलग है। अधिकारियों का कहना है कि सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को जिला अदालत ने बरकरार रखा था और उसी कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की गई। इसलिए खबर में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

मस्जिद का क्या है पूरा मामला? Mosque Demolition Controversy
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित यह मस्जिद काफी पुरानी बताई जाती है। अलग-अलग पक्षों की ओर से इसकी उम्र को लेकर अलग दावे सामने आए हैं। मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि यह कई दशक पुरानी है, जबकि कुछ नेताओं ने इसे 1911 से पहले की बताया है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक मस्जिद करीब 3000 वर्गफुट क्षेत्र में स्थित थी और पिछले वर्ष इसे लेकर शिकायत प्रशासन तक पहुंची थी। Mosque Demolition Controversy
मामला वर्ष 2025 में उस समय सामने आया, जब मस्जिद को सरकारी जमीन पर कथित अनधिकृत कब्जा बताते हुए शिकायत की गई। इसके बाद राजस्व विभाग की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हुई। 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने मस्जिद को सरकारी भूमि पर अनधिकृत निर्माण मानते हुए उसे हटाने का आदेश दिया और करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति भी तय की।
मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को चुनौती देते हुए जिला जज की अदालत का रुख किया। रिपोर्टों के अनुसार 20 जुलाई को अपील दाखिल की गई और मामले में कई तारीखों पर सुनवाई हुई। आखिरकार 2 सितंबर को जिला अदालत ने अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।
इसके बाद 5 सितंबर की सुबह कलेक्ट्रेट परिसर में भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। प्रशासन ने कलेक्ट्रेट के पांचों गेट बंद कर दिए थे और बड़ी संख्या में पुलिस तथा अन्य सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी।
इसी कार्रवाई ने अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अदालत के फैसले के बाद अपील अथवा अन्य कानूनी उपायों के लिए बची अवधि के दौरान ध्वस्तीकरण किया जाना उचित था?
इकरा हसन का कहना है कि मुस्लिम पक्ष हाईकोर्ट जाने वाला था। अमर उजाला की रिपोर्ट में भी उनके बयान के हवाले से बताया गया है कि सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में समय दिया गया था और उनके अनुसार करीब 22 दिन की अवधि बाकी थी। उन्होंने कार्रवाई को जल्दबाजी बताते हुए हाईकोर्ट जाने की बात कही है।
“लिखित आदेश कहां है?”—इकरा हसन ने उठाया सवाल
कैराना सांसद इकरा हसन ने सहारनपुर में कहा कि मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई को लेकर कई सवाल हैं। उनका आरोप है कि जब मुस्लिम पक्ष के पास कानूनी लड़ाई का रास्ता खुला था और हाईकोर्ट जाने की तैयारी थी, तो प्रशासन को इतनी जल्दी कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी। Mosque Demolition Controversy
इकरा हसन के मुताबिक मस्जिद को गिराने के लिए कोई स्पष्ट लिखित ध्वस्तीकरण आदेश सामने नहीं रखा गया। उन्होंने इसे कानून और इंसाफ के तकाजों के खिलाफ बताया और कहा कि इस मामले को वह आगे कानूनी स्तर पर उठाएंगी। अमर उजाला की 7 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक इकरा हसन ने कहा कि वह इस मामले में राज्यपाल और प्रधानमंत्री से भी मिलने का प्रयास करेंगी।
वहीं दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई अदालत द्वारा बरकरार रखे गए आदेश के आधार पर की गई। सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने संरचना को सरकारी जमीन पर अवैध पाया था और जिला अदालत द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद प्रशासन ने कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की।
यानी विवाद की असल जड़ यही है कि अदालत ने 2 सितंबर को क्या आदेश दिया और प्रशासन ने उसके आधार पर किस अधिकार से तत्काल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। इंडियन एक्सप्रेस की कानूनी पड़ताल में यह बात सामने आई कि 2 सितंबर के जिला अदालत के आदेश ने अपील खारिज कर सिटी मजिस्ट्रेट के जुलाई वाले आदेश को बरकरार रखा था, जबकि उस आदेश में सीधे “ध्वस्तीकरण” का निर्देश होने को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
मस्जिद कमेटी के मुतवल्ली तनवीर अहमद ने भी दावा किया कि अदालत का आदेश बेदखली से संबंधित था और सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं था। उन्होंने कार्रवाई को चुनौती देने की बात कही है।
मस्जिद के मलबे में मिला पुराना कुआं, अब इतिहास भी जांच के घेरे में
मस्जिद गिराए जाने के बाद मामला केवल कानूनी और सियासी विवाद तक सीमित नहीं रहा। मलबा हटाने के दौरान मौके पर करीब 20 फुट गहरी और लगभग डेढ़ मीटर चौड़ी कुएं जैसी पुरानी संरचना मिलने की खबर सामने आई है। इसके बाद पुरातत्व विभाग की दिलचस्पी भी इस जगह में बढ़ गई है। Mosque Demolition Controversy
7 सितंबर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया और संरचना के नमूने लिए। अधिकारियों का उद्देश्य इसकी उम्र, निर्माण शैली और ऐतिहासिक महत्व का पता लगाना है।

कुछ रिपोर्टों में इस संरचना की उम्र 200 से 250 वर्ष तक होने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन अभी इसे किसी खास ऐतिहासिक काल से जोड़ना जल्दबाजी होगी। पुरातत्व अधिकारियों ने भी किसी अंतिम निष्कर्ष से पहले विस्तृत जांच की जरूरत बताई है। Mosque Demolition Controversy
मस्जिद को लेकर एक तरफ प्रशासन का कहना है कि वह सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण था, वहीं मुस्लिम पक्ष लंबे समय से इसके पुराने अस्तित्व और मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेजों का दावा करता रहा है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी मस्जिद को 1911 से पहले की बताते हुए राजस्व रिकॉर्ड में पुराने नाम दर्ज होने का दावा किया है। इन दावों की कानूनी वैधता का फैसला संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में होना है।
इस पूरे घटनाक्रम ने सहारनपुर के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत को भी गरमा दिया है। इकरा हसन को मस्जिद ध्वस्तीकरण के दौरान सहारनपुर जाने से रोके जाने और हाउस अरेस्ट किए जाने की खबरें भी सामने आईं। बाद में वह सहारनपुर पहुंचीं और मामले को लेकर प्रशासन पर सवाल उठाए।
विपक्षी दलों ने मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है, जबकि सत्ता पक्ष और प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई किसी धार्मिक आधार पर नहीं बल्कि सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जे के मामले में अदालत के आदेश के अनुपालन में की गई। Mosque Demolition Controversy
इस बीच सबसे जरूरी बात यह है कि संवेदनशील धार्मिक मामलों में कानून, अदालत के आदेश और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। यदि किसी पक्ष को लगता है कि उसके कानूनी अधिकारों की अनदेखी हुई है तो उसे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। दूसरी तरफ यदि अदालत ने किसी निर्माण को सरकारी जमीन पर अनधिकृत पाया है तो उसके आदेश का पालन भी कानून के मुताबिक होना चाहिए।
सहारनपुर की इस घटना ने यही सवाल फिर सामने ला दिया है कि बुलडोजर से पहले कानून की हर सीढ़ी पूरी तरह साफ होनी चाहिए या नहीं? इस सवाल का जवाब अदालत और जांच की प्रक्रिया से ही सामने आएगा। Mosque Demolition Controversy
फिलहाल इकरा हसन ने इस मामले को आगे कानूनी स्तर पर उठाने की बात कही है। वहीं मस्जिद के मलबे से मिली पुरानी संरचना ने इस विवाद में एक नया ऐतिहासिक पहलू जोड़ दिया है। आने वाले दिनों में अदालत, प्रशासन और पुरातत्व विभाग की जांच से यह साफ हो सकता है कि इस पूरे मामले की कानूनी और ऐतिहासिक तस्वीर वास्तव में क्या है। Mosque Demolition Controversy
Sources: Indian Express , NDTV, Amar Ujala











