Saharanpur Mosque Demolition: सहारनपुर।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में शनिवार की सुबह उस वक्त सियासी और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई, जब कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर स्थित मस्जिद को प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई तड़के करीब 4 से 5 बजे के बीच भारी पुलिस बल की मौजूदगी में की गई। कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही और बाहरी लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई।
प्रशासन की ओर से इस मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण माना गया था। नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने जुलाई में मस्जिद को हटाने का आदेश दिया था और संबंधित पक्ष पर करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति/जुर्माने का आदेश भी दिया गया था। मस्जिद कमेटी ने इस फैसले को जिला अदालत में चुनौती दी, लेकिन 2 सितंबर को अपील खारिज होने के बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कर दी।
मामला महज एक इमारत को हटाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसके साथ जमीन के मालिकाना हक, मस्जिद की पुरानियत, दस्तावेजों की विश्वसनीयता, कानूनी प्रक्रिया और धार्मिक स्थलों के संरक्षण को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

मस्जिद की पृष्ठभूमि और 1911 के बिजली बिल का विवाद
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की इस मस्जिद को लेकर पिछले करीब डेढ़ वर्ष से विवाद चल रहा था। शिकायत के बाद नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में सार्वजनिक परिसर से अनधिकृत कब्जा हटाने से संबंधित कानून के तहत मामला चला। अदालत ने सरकारी अभिलेखों और राजस्व रिकॉर्ड को आधार बनाते हुए खसरा संख्या-539 की करीब 315 वर्गमीटर भूमि को सरकारी जमीन माना और मस्जिद के निर्माण को अनधिकृत बताया।
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दूसरी ओर, मस्जिद कमेटी का पक्ष रहा कि यह कोई हालिया निर्माण नहीं है, बल्कि यहां लंबे समय से मस्जिद मौजूद है। कमेटी की ओर से अदालत में 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल भी पेश किया गया। इसके जरिए यह दलील दी गई कि कलेक्ट्रेट के वर्तमान स्वरूप से पहले ही यहां मस्जिद का अस्तित्व था। पक्षकारों ने राजस्व रिकॉर्ड में वाहिद खान और याकूब खान के नाम तथा पुराने दस्तावेजों का भी हवाला दिया।
हालांकि प्रशासन की ओर से इस बिजली बिल की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया गया। उपलब्ध अदालती रिपोर्टों के मुताबिक सरकारी पक्ष ने दलील दी कि सहारनपुर में बिजली आने की तारीख और बिजली वितरण के रिकॉर्ड 1911 के दावे से मेल नहीं खाते। कुछ रिपोर्टों में पहली बिजली आपूर्ति के संबंध में 1922 और वितरण के लिए 1928 का उल्लेख है। साथ ही 1 जनवरी 1911 के दिन रविवार होने का तर्क भी अदालत में रखा गया।
यही बिंदु इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया। एक तरफ मस्जिद कमेटी पुराने दस्तावेजों को अपनी दलील का आधार बता रही थी, वहीं प्रशासन और अदालत ने उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड को अधिक महत्व दिया। जिला अदालत ने भी सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।
इमरान मसूद का हमला—“संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं”..Saharanpur Mosque Demolition
मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रशासन और सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई केवल एक मस्जिद को गिराने का मामला नहीं है, बल्कि इससे संविधान और कानून की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठते हैं।
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इमरान मसूद के मुताबिक मस्जिद के पुराने होने और जमीन के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज प्रशासन के सामने रखे गए थे। उनका दावा है कि जमीन के रिकॉर्ड में आज भी वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज हैं और प्रशासन ने केवल खसरा रिकॉर्ड के आधार पर जमीन को सरकारी मान लिया।
मसूद ने यह भी सवाल उठाया कि यदि प्रशासन मस्जिद वाली जमीन को अपनी बताता है तो उसे मालिकाना हक का पूरा आधार भी स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “खसरा मौजूदा स्थिति बताता है, मालिकाना हक का पूरा आधार नहीं होता।” यह उनका राजनीतिक और कानूनी तर्क है, जबकि अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर प्रशासन के पक्ष को स्वीकार किया है।
इमरान मसूद ने कार्रवाई को संविधान के खिलाफ बताते हुए कहा कि कांग्रेस इस मामले को कानूनी तौर पर आगे ले जाएगी और जरूरत पड़ी तो मामला हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनके अनुसार संबंधित दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों को उचित महत्व नहीं दिया गया। Saharanpur Mosque Demolition
इस पूरे घटनाक्रम में कैराना की सपा सांसद इकरा हसन की प्रतिक्रिया भी सामने आई। इकरा हसन ने आरोप लगाया कि लोग अधिकारियों से बातचीत कर कुछ समय मांगना चाहते थे ताकि मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सके, लेकिन उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया गया। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई को शर्मनाक और लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ बताया तथा कहा कि इस मामले को अदालत में ले जाया जाएगा। उनके अनुसार “क्विक जस्टिस” को सामान्य तरीका नहीं बनाया जाना चाहिए और कानून की प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए।
इकरा हसन के मुताबिक उन्हें सहारनपुर जाने से पहले उनके आवास पर रोका गया। हालांकि प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर अलग दृष्टिकोण सामने आया है। इस मामले में पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
मौलाना खालिद रशीद ने भी जताई नाराजगी, धार्मिक स्थलों की सुरक्षा की अपील
लखनऊ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने भी सहारनपुर की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए धार्मिक स्थलों की हिफाजत की अपील की। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों के मामले में सरकार को अत्यंत सावधानी और संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए।
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उन्होंने धार्मिक स्थलों से जुड़े कानून और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि देश की परंपरा, संस्कृति और कानून के मुताबिक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा जरूरी है। उनका कहना था कि मस्जिदों और दूसरे धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों का हल कानून और संवाद के रास्ते से निकाला जाना चाहिए।
इस बीच प्रशासन का स्पष्ट पक्ष यह है कि कार्रवाई अदालत के आदेश और कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है। अदालत ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण माना था और बाद में जिला अदालत ने भी सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। इसलिए इस कार्रवाई को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति पर आगे उच्च न्यायालयों में होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
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सहारनपुर की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि पुराने धार्मिक स्थलों से जुड़े जमीन विवादों का समाधान किस तरह किया जाए। एक पक्ष दस्तावेजों, पुरानी मिल्कियत और धार्मिक उपयोग का हवाला देता है तो दूसरा पक्ष सरकारी भूमि और राजस्व रिकॉर्ड को आधार बनाता है। ऐसे संवेदनशील मामलों में कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता और सभी पक्षों को पर्याप्त अवसर मिलना बेहद अहम माना जाता है।
फिलहाल मस्जिद का ढांचा जमींदोज हो चुका है, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ। इमरान मसूद ने कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है और मस्जिद पक्ष भी ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। आने वाले दिनों में अदालत में पेश होने वाले दस्तावेज और दलीलें यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी कि इस विवाद का अगला अध्याय क्या होगा।
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Sources : Indian Express , सहारनपुर जिला प्रशासन, PTI , ANI











