Jauhar University Demolition Case:
देवबंद /रामपुर। शिक्षा किसी भी समाज की वह बुनियाद है, जिस पर आने वाली नस्लों का भविष्य खड़ा होता है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होते, बल्कि उनमें हजारों छात्र-छात्राओं के सपने, उनके माता-पिता की उम्मीदें और मुल्क के मुस्तकबिल की तस्वीर छिपी होती है। ऐसे में जब किसी बड़े तालीमी इदारे पर कानूनी या प्रशासनिक संकट आता है तो उसका असर सिर्फ किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे तौर पर विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ जाता है।
इसी सोच के तहत मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी, रामपुर को लेकर छात्र-छात्राओं और समाज के सामने एक अपील रखी जा रही है कि तालीमी इदारों को सियासी मतभेदों से ऊपर रखकर देखा जाए। किसी संस्था में प्रशासनिक, कानूनी या निर्माण संबंधी कमी है तो उसका समाधान कानून और बातचीत के जरिए होना चाहिए, लेकिन कार्रवाई का ऐसा असर नहीं पड़ना चाहिए जिससे पढ़ने वाले विद्यार्थियों का भविष्य असमंजस में चला जाए।
मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर स्थापित की गई संस्था है। विश्वविद्यालय की स्थापना उत्तर प्रदेश विधानसभा के अधिनियम के तहत वर्ष 2006 में हुई थी। विश्वविद्यालय की अपनी वेबसाइट के मुताबिक इसका उद्देश्य विभिन्न विषयों में उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना है और यहां स्नातक, परास्नातक तथा शोध स्तर के कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

ऐसे में मौजूदा विवाद को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय यह भी जरूरी है कि छात्रों की पढ़ाई, शिक्षकों की नौकरी और शिक्षा के माहौल पर इसके असर को गंभीरता से समझा जाए।
38 भवनों के ध्वस्तीकरण से शुरू हुआ नया विवाद।
जौहर यूनिवर्सिटी इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में इसलिए है क्योंकि रामपुर विकास प्राधिकरण यानी RDA ने 15 जुलाई 2026 को विश्वविद्यालय परिसर की 40 इमारतों में से 38 को कथित तौर पर बिना स्वीकृत नक्शे के निर्माण बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया था। विश्वविद्यालय प्रबंधन को इन निर्माणों को हटाने के लिए समय दिया गया था। Jauhar University Demolition Case
विश्वविद्यालय प्रबंधन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए मंडलायुक्त न्यायालय का रुख किया। इसके बाद 27 जुलाई को मंडलायुक्त की अदालत ने 38 भवनों के ध्वस्तीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसके बाद से मामला कानूनी प्रक्रिया में है और फिलहाल बुलडोजर कार्रवाई पर रोक बनी हुई थी।
मामले में विश्वविद्यालय की तरफ से यह दलील भी रखी गई कि निर्माण के अलग-अलग दौर के समय लागू नियम और मास्टर प्लान को ध्यान में रखा जाना चाहिए। अगस्त में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों से जरूरी दस्तावेज और अभिलेखीय साक्ष्य पेश करने को कहा था। विश्वविद्यालय पक्ष ने पुराने निर्माण से संबंधित रिकॉर्ड सरकारी विभागों से मंगाए जाने की मांग भी की थी।
25 अगस्त की सुनवाई के बाद नई मंडलायुक्त संगीता सिंह के सामने मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 के लिए निर्धारित होने की जानकारी सामने आई है। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक नई मंडलायुक्त ने कार्यभार संभालने के बाद इस मामले के लिए आगे की तारीख तय की।
इसका मतलब साफ है कि फिलहाल यह मामला अंतिम फैसले तक नहीं पहुंचा है। इसलिए सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
तालीमी इदारे को सियासत से अलग रखने की जरूरत: अरशद मदनी
जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा जौहर यूनिवर्सिटी का विवाद केवल भवनों के नक्शे या जमीन के सवाल तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक बड़ा सवाल शिक्षा की हिफाजत का भी जुड़ा हुआ है। Jauhar University Demolition Case

उन्होंने कहा किसी भी विश्वविद्यालय में यदि निर्माण नियमों, जमीन, प्रशासन या दूसरे कानूनी मामलों को लेकर कोई कमी सामने आती है तो उसे कानून के मुताबिक दूर किया जाना चाहिए। अगर संस्था की ओर से गलती हुई है तो उसे नियमानुसार सुधारने का अवसर मिलना चाहिए और यदि सरकारी विभाग की कार्रवाई में कोई कमी है तो न्यायिक प्रक्रिया के जरिए उसका समाधान होना चाहिए।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा ध्यान उन विद्यार्थियों पर होना चाहिए, जिन्होंने अपनी जिंदगी के कई साल शिक्षा हासिल करने में लगा दिए हैं। Jauhar University Demolition Case
मदनी ने कहा किसी छात्र ने फीस जमा की है, किसी ने हॉस्टल लिया है, किसी ने डिग्री के लिए वर्षों मेहनत की है और किसी परिवार ने अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए आर्थिक बोझ उठाया है। ऐसे में किसी तालीमी इदारे के भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है तो सबसे पहले सवाल छात्र के भविष्य का होना चाहिए।
यही वजह है कि छात्रों से यह अपील की जा सकती है कि वे अपने तालीमी मुस्तकबिल को किसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा न बनने दें। वे शिक्षा हासिल करें, अपने अधिकारों और संस्थान की स्थिति की जानकारी रखें तथा किसी भी कानूनी या प्रशासनिक मामले में तथ्य और अदालत के आदेश को प्राथमिकता दें।
साथ ही विश्वविद्यालय प्रबंधन की भी जिम्मेदारी है कि वह छात्रों के सामने संस्थान की कानूनी स्थिति, मान्यता, पाठ्यक्रम, परीक्षा और डिग्री से जुड़े तमाम मामलों में पूरी पारदर्शिता रखे। Jauhar University Demolition Case
विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर 2026-27 सत्र के लिए प्रवेश खुले होने की जानकारी दी गई है। वहीं UGC की वेबसाइट पर मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को निजी विश्वविद्यालयों की सूची में दर्ज किया गया है, हालांकि UGC के वर्तमान रिकॉर्ड में विश्वविद्यालय के संबंध में पुनः निरीक्षण और जानकारी मांगे जाने का उल्लेख भी है। इसलिए दाखिला लेने वाले छात्रों और अभिभावकों के लिए यह जरूरी है कि वे जिस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना चाहते हैं, उसकी मौजूदा मान्यता और संबंधित नियामक संस्था की स्थिति स्वयं सत्यापित करें।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम से जुड़ी विरासत और आज का संकट
मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का नाम स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े महान नेता और पत्रकार मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है। विश्वविद्यालय के संस्थापक पक्ष के अनुसार यह संस्था मौलाना मोहम्मद अली जौहर की तालीमी और राष्ट्रीय विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित की गई। विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उत्तर प्रदेश विधानमंडल ने कानून पारित किया था और यह अधिनियम 2006 में प्रभावी हुआ। Jauhar University Demolition Case
विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे वरिष्ठ समाजवादी नेता आजम खान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर भी आजम खान को चांसलर के रूप में दर्शाया गया है और बताया गया है कि संस्थान की स्थापना मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के माध्यम से की गई।
यही राजनीतिक जुड़ाव इस संस्थान को लंबे समय से सियासी बहस के केंद्र में भी रखता आया है। मौजूदा ध्वस्तीकरण विवाद में भी विपक्षी दलों और आजम खान समर्थकों की ओर से कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं, जबकि प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई निर्माण नियमों के उल्लंघन से जुड़ी है। यानी दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं और अंतिम तस्वीर कानूनी प्रक्रिया से ही साफ होगी। Jauhar University Demolition Case
जुलाई 2026 में छात्रों और समर्थकों ने ध्वस्तीकरण के विरोध में धरना भी दिया था। अंतरिम राहत मिलने के बाद छात्रों का धरना समाप्त हुआ।
इसके साथ ही यूनिवर्सिटी से होकर गुजरने वाली सड़क को लेकर भी विवाद सामने आया। जुलाई में उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग ने विश्वविद्यालय परिसर से गुजरने वाली सड़क को सार्वजनिक उपयोग की सड़क बताते हुए साइनबोर्ड लगाने की बात कही थी। यह मामला भी अदालत में लंबित बताया गया।
शिक्षा का सवाल सबसे ऊपर..Jauhar University Demolition Case
आज जरूरत इस बात की है कि जौहर यूनिवर्सिटी के मामले को किसी व्यक्ति या पार्टी की जीत-हार के रूप में न देखा जाए। असल सवाल यह होना चाहिए कि कानून भी कायम रहे और छात्रों की तालीम भी प्रभावित न हो। Jauhar University Demolition Case
अगर 38 भवनों के संबंध में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसका कानूनी समाधान होना चाहिए। अगर विश्वविद्यालय के पास पुराने नक्शे, दस्तावेज और सरकारी रिकॉर्ड हैं तो उन्हें भी निष्पक्ष रूप से जांचा जाना चाहिए। अदालत और सक्षम प्रशासनिक संस्थाओं को सभी पक्षों को सुनकर फैसला करना चाहिए।
इसी तरह छात्रों को भी भावनात्मक अपीलों से आगे बढ़कर अपने भविष्य के बारे में व्यावहारिक फैसला लेना चाहिए। किसी भी विश्वविद्यालय में दाखिले से पहले पाठ्यक्रम की मान्यता, परीक्षा व्यवस्था, डिग्री की वैधता, फीस, हॉस्टल और भविष्य में रोजगार से जुड़े पहलुओं की जानकारी लेना जरूरी है।
तालीम किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी है। इसलिए जौहर यूनिवर्सिटी हो या देश का कोई भी दूसरा शैक्षणिक संस्थान, कमियों को दूर करने की कोशिश होनी चाहिए, मगर छात्रों की पढ़ाई और भविष्य को संकट में डालकर नहीं।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर का नाम पत्रकारिता, आजादी की जद्दोजहद और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा हुआ है। उनके नाम पर बने किसी भी तालीमी इदारे से यही उम्मीद की जानी चाहिए कि वह इल्म, तहजीब, रिसर्च और बेहतर नागरिक तैयार करने का केंद्र बने। Jauhar University Demolition Case
आज जरूरत टकराव की नहीं, तामीर की है; सियासी बयानबाजी की नहीं, तालीमी बेहतरी की है; और आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया की है।
जौहर यूनिवर्सिटी का मौजूदा मामला अदालत और प्रशासन के सामने है। 10 सितंबर की प्रस्तावित सुनवाई के बाद तस्वीर आगे और साफ हो सकती है। तब तक छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के सभी जिम्मेदार लोगों को संयम के साथ मामले को देखना चाहिए।
किसी भी तालीमी इदारे की हिफाजत का मतलब कानून से ऊपर जाना नहीं है। बल्कि इसका मतलब है कि कानून के दायरे में रहकर शिक्षा, छात्रों और उनके भविष्य की हिफाजत सुनिश्चित की जाए। Jauhar University Demolition Case
Sources : UGC , The New Indian Express , ABP Live/PTI , India Today











